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दिल गार्डेन-गार्डेन हो गया

भारतीय फुटबॉल में तो कभी कुछ ऐसा नहीं रहा जो हमें आकर्षित करे मगर एशियन फुटबॉल कंफेडरेशन की हिन्दी में जारी ये आधिकारिक वेबसाइट देखकर दिल गार्डेन-गार्डेन हो गया. आप भी देखिये... एशियन फुटबॉल कंफेडरेशन

वो भीख नहीं मांगता

(आज से मुम्बई ब्लॉग में मैं कहानियों की एक नई श्रृंखला की शुरुआत कर रहा हूं. मेरी कहानियों का नायक तो मुझे मिल गया है लेकिन उसका नामकरण संस्कार होना अभी बाकी है. ब्लॉग बिरादरी से मेरा यह आग्रह है कि मेरी कहानी के नायक के लिए कोई बढ़िया-सा नाम सुझाये. नाम देने के लिए मेरा नायक आप सबका आभारी रहेगा.) वो भीख नहीं मांगता अमूमन उसके जैसे लड़के स्टेशनों पर भीख़ ही मांगते हैं मगर वो अंधेरी स्टेशन पर पानी की बोतलें बेचता है. दस रुपये की एक बोतल के पीछे उसे दो रुपये मिल जाते हैं. इससे ज्यादा तो उसके साथी भगवान या अल्लाह के नाम पर कमा लेते हैं... शायद किसी स्वाभिमानी का खून है ये. उसकी उम्र अभी यही कोई नौ-दस होगी मगर बला की फूर्ति है लड़के में. जब से उसे देखा है ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं रह गयी है, उल्टे खुद पर कोफ़्त हो रही है कि अब तक ज़िंदगी से शिकायत ही क्यों थी? उस दिन सबेरे खचाखच भरी चर्चगेट लोकल में उल्टी तरफ गेट पर खड़ा ललित नारायण मिश्रा से लेकर लालू यादव तक, सभी रेलमंत्रियों को मन-ही-मन कोस रहा था. अंधेरी स्टेशन पर लोकल पहुंची, प्लेटफॉर्म की तरफ वाली गेट पर चढ़ने-उतरने वालों के रेला का इस तरफ ...

तबाही के मंजर पर मुम्बईया हौसले की जीत

ऐसा मंजर जो कल तक ख़्वाबों की हद में भी नहीं था, आज हकीकत बन हम सब को दहला गया. एक तरफ मुम्बई महानगर सदी की सबसे भयानक बारिश की मार झेल रहा था तो दूसरी तरफ समुद्र के बीच मुम्बई हाई में लपटों का कहर टूट पड़ा. इन दोनों घटनाओं को जब हम एक साथ देखते हैं, तो अपने भीतर गहराई तक पीड़ा का अहसास घर कर जाता है. मुम्बई में 24 घंटों के दौरान लगभग सौ सेंटीमीटर पानी बरस पड़ा. ऐसे समय, जब समन्दर में ज्वार उठा हो, शहर को डूबना ही था. इस आपदा ने देश की आर्थिक राजधानी को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है. जिंदगी को पटरी पर आने में कुछ समय लगेगा और नुकसान के घाव भी धीरे-धीरे ही भर पाएंगे. एक मुम्बईकर होने के नाते इतना तो यकीन है कि मुम्बई बहुत जल्द अपने पुराने रंग में लौट आयेगी. प्रधानमंत्री का मुम्बईकरों के जज्बे को सलाम करना मेरे इस यकीन को बल देता है. सबसे बड़ी बात तो काबिलेगौर है कि बाढ़, बारिश और अंधकार के उन क्षणों में भी मुम्बईकरों ने धीरज नहीं छोड़ा और गुस्से से परहेज किया. इस बात को न सिर्फ मुम्बई के आकाओं बल्कि केंद्र की सरकार द्वारा भी कद्र की जानी चाहिए. मुम्बई में बारिश की तस्वीरें

भारी बरसात से मुम्बई में अफरा-तफरी का माहौल

आज मुम्बई में मौसम की सबसे जोरदार बारिश हुई है जो अभी लगातार जारी है. जिससे शहर की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है. अभी रात के 11.30 बजे भी सड़कों पर है गाड़ियों की लम्बी कतारें और हैरान-परेशान लोग. यहां की जीवन रेखा कहीं जाने वाली लोकल ट्रेनों की रफ्तार भी धीमी पड़ गई है. रफ्तार के इस शहर में मानो सबकुछ थम-सा गया है. यहां लोग 40-50 किलोमीटर दूर घंटे-डेढ़ घंटे का सफर कर काम करने मध्य और दक्षिण मुम्बई की ओर आते हैं. यूं तो छिटपुट बारिश पिछले दो-तीन दिनों से हो रही है मगर आज दिन की बारिश में सबकुछ अस्त-व्यस्त कर दिया. यहां तक कि कुछ घंटों के लिए फोन सेवाएं भी बुरी तरह बाधित रहीं. सुबह तक तो लगभग सबकुछ ठीक था. मगर शाम तक कई इलाकों में रेलवे ट्रैक और सड़कों पर पानी भर गया जिससे स्टेशनों पर भारी भीड़ और सड़कों पर गाड़ियों की कतारें दिखने लगी. मेरा घर भी लोअर परेल स्थित मेरे ऑफिस से घंटे भर की दूरी पर है, इसीलिए मैं तो शाम को ही द्फ्तर के पास ही रहने वाले एक दोस्त के घर जा पहुंचा. वहां मीडिया वाले कुछ और दोस्त धमके हुए थे. सबके अलग-अलग सूत्रों से अलग-अलग तरह की ख़बरे मिली. रात को जब फोन सेवाएं बहाल ...

डर हमारी जेबों में

प्रमोद कुमार तिवारीजी के उपन्यास 'डर हमारी जेबों में' का अंश पढ़िये. बड़ा खूबसूरत और मार्मिक है यह... वैसे तो उपन्यास कुछ पुराना है लेकिन इस बार कथा, यूके ने इसे इंदु शर्मा-2005 पुरस्कार से सम्मानित करने का फ़ैसला किया है और इसी से यह पुस्तक एक बार फिर प्रासंगिक हो गई है. उपन्यास के अंश के लिए यहां क्लिक करें.

प्रेमकंद बनाम प्रेमचंद

(पिछले आलेख " प्रेमचंद का बॉयोडाटा " के संदर्भ में) कन्फ्युजियाइये मत स्वामीजी , ई न टाईपो है आउर न ह्युमर है, ई तो हमरा आपन मिस्टेक बुझा रहा है. अभी ठीक किये देते हैं. वैसे हमको हमरा विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि श्री प्रेमचंदजी अपनी आत्मा हमरा भीतर प्रवेश करवाकर हमरा से ई ग़लती करवाएं हैं. अभी भाया चित्रगुप्तजी हम प्रेमचंदजी से संपर्क करने का कोशिश किया. वहां से एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिये स्पष्टीकरण आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि उ चैनल बाबू के लिए का प्रेमचंद?.. का प्रेमकंद आउर का शकरकंद?... सब धन बाइस पसेरी. इसीलिए प्रेमचंदजी की आत्मा की इच्छा थी कि चैनल बाबू जैसे लोगों को प्रेमकंद या शकरकंद या चाहे जिसका बायोडाटा भिजवाना हो भिजवा दिया जाए. प्रेमचंद की किताबों के बारे में बिल्कुल न बताया जाए वरना जीते जी तो अब नहीं कह सकते, हां मरते जी फिर से मर जाएंगे. फिर हमने दूबारा निवेदन किया श्री प्रेमचंदजी, इस धरती पर स्वामीजी जैसे लोग भी हैं जो 'प्रेमकंद' के नहीं, 'प्रेमचंद' और उनके साहित्य के रसिक है. निवेदन स्वीकृत हो गया है और अब दुनिया के सामने 'प्रे...