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नौकरी चाहिये तो हिन्दी पढ़ो

क्या आप जानते हैं महाराष्ट्र के पूर्व उप-मुख्यमंत्री की नौकरी जाने के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता आर.आर. पाटील इन दिनों क्या कर रहे हैं? इन दिनों वे अपनी हिन्दी सुधारने लगे हैं। आबा के नाम से मशहूर श्री पाटिल को मलाल है कि उनकी हिन्दी अच्छी नहीं होने के कारण उनके बयानों को गलत संदर्भ में लिया गया जिससे उनकी नौकरी चली गई। मतलब ये कि उन्होंने जो कुछ भी ग़लत हिन्दी में कहा उसका मतलब कुछ और था। (अब चलिये मतलब आप हिन्दी सीखकर कभी समझा दीजियेगा।) पूरा पढ़ें

ब्लॉग बना चिट्ठा, जम गई चिट्ठाकारिता

इंटरनेट पर इन दिनों ब्लॉगिंग की खूब चर्चा है, हालाँकि इसकी शुरुआत तकरीबन दस साल पहले अँग्रेजी में हुई थी मगर अब हिंदी लिखने-पढ़ने वालों में भी यह विधा लोकप्रिय हो चली है. ब्लॉग यानी इंटरनेट पर डायरीनुमा व्यक्तिगत वेबसाइटें, जिसके लिए हिंदी में ‘चिट्ठा’ नाम प्रचलित और स्थापित हो चुका है. महज साढ़े चार साल पहले हिंदी ब्लॉग लेखन की शुरुआत हुई थी और आज हिंदी चिट्ठों की तादाद हज़ार से ऊपर है. मगर इस विधा को हिंदी में अपनाना कोई आसान काम नहीं था. शुरुआती दौर को तकनीकी गुरू और चिट्ठाकार रवि रतलामी कुछ यों याद करते है, “उन दिनों दो सवाल खूब पूछे जाते थे. पहला तो ये कि कंप्यूटर पर हिंदी नहीं दिखती, क्या करें? और दूसरा ये कि हिंदी दिखती तो है मगर हिंदी में लिखें कैसे?” ये सवाल हालाँकि लोग अब भी पूछते हैं लेकिन भोमियो और गूगल इंडिक ट्रांसलिटरेशन टूल जैसी सुविधाओं के आ जाने से देवनागरी लिखना पहले के मुक़ाबले बहुत आसान हो गया है. इंटरनेट पर हिंदी और ब्लॉगिंग से जुड़ी ऐसी तमाम परेशानियों को दूर करने के उद्देश्य से तकनीक के जानकार चिट्ठाकार अपने चिट्ठों पर समय-समय पर लिखते रहे हैं जिन्हें खू...

मुम्बई ब्लॉगर मीट और बची हुई कलेजी

बाज़ार में हुई मारामारी के बीच मुम्बई ब्लॉगर मीट के भी खूब चर्चे रहे। वैसे तो सबने इस मीट को तेल-मसाला डालकर, छौंक-बघार लगाकर मजे से पकाया, खाया-खिलाया। बिना किसी परेशानी के इस मीट को लोग पचा भी गये… जो पचने से रह गया उसे अब तक तो सब संडास के भी हवाले कर चुके होंगे। अब आप कहेंगे कि जब सब कुछ हो चुका तो मैं मटियाने की जगह फिर से उस मीट को लेकर क्यों बैठ गया। अरे भैया, वो इसलिए कि जब मीट पक रहा था तभी मैंने कड़ाही में से कलेजी निकालकर कटोरी में डालकर फ्रीज में छूपा दिया था। आइये उस कलेजी का स्वाद चखें… बहुत दिनों तक चिट्ठाकारी की दुनिया में अंग्रेजन के इ दहेजुआ नगरी मुम्बई का झंडा उठाये-उठाये हमरा हाथ टटा गया था… बड़ा सकुन मिला जब हमरी कठपिनसिन की जगह प्रमोद भाई और अभय भाई जैसों की शानदार कलम ने ली। लगा जैसा धर्मवीर भारती और राजेन्द्र माथुर मुम्बई की प्रतिष्ठा बचाने मैदान में आ गये हों। हमरी खुशी को तो अभी अंधेरी लोकल की जगह विरार फास्ट की सवारी करनी थी। पता चला कि रफी साहब ने युनुस भाई का रूप धरा है और धीरूभाई की आत्मा अपने कमल शर्माजी के भीतर आ घूसी है। बड़ी तमन्ना थी इन महानुभवों से मिलन...

पॉडभारती यानी अपनी बोली में अपनी बात

पॉडपत्रिका पॉडभारती का पहला अंक जारी कर दिया गया है। कार्यक्रम का संचालन किया है देबाशीष चक्रवर्ती ने और परिकल्पना है देबाशीष और शशि सिंह की। इस प्रथम अंक में आप सुनेंगे। हिन्दी चिट्ठाकारी ने अप्रेल 2007 में चार साल पूरे किये हैं। ये फासला कोई खास तो नहीं पर कई लोग इसी बिना पर पितृपुरुष और पितामह कहलाये जाने लगे हैं और अखबारों में छपने लगे हैं। पॉडभारती के लिये चिट्ठाकारी के इस छोटे सफर का अवलोकन कर रहे हैं लोकप्रिय चिट्ठाकार अनूप शुक्ला । गूगल के हिन्दी ट्रांसलिटरेशन टूल के प्रवेश से हिन्दी चिट्ठाकारी को एक नया आयाम मिला है। इस टूल के बारे में और जानकारी देंगे टेकगुरु रविशंकर श्रीवास्तव । मोहल्ला हिन्दी का एक नया पर चर्चित ब्लॉग है। यहाँ इरफान के हवाले से लिखे एक लेख ने ऐसा हंगामा बरपा किया कि हिन्दी चिट्ठाजगत ही ध्रुवों में बंट गया। बहस वाया सांप्रदायिकता लानत मलानत और एक दूसरे के गिरेबान तक जा पहूंची। मुहल्ला पर अविनाश के माफ़ीनामे तक से मामला अब तक ठंडा नहीं पड़ा। इसी संवेदनशील विषय पर सुनिये पॉडभारती के शशि सिंह की खास रपट। आपको हमारा ये प्रयास कैसा लगा, हमें टिप्पणी द्वारा या ...

गुरू के गुरू मनिरत्नम

कहीं पढ़ा था कि फिल्म गुरू के प्रीमियर पर जुनियर बच्चन का अभिनय देख बिग बी की आंखें नम हो गई. हो भी क्यों न? किसी भी बेटे की तरक्की पर हर पिता इसी तरह तो खुशी मनाते हैं. गुरू फिल्म में छोटे बच्चन वाकई बड़े हो गये दीखते हैं. अमिताभ बच्चन के बेटे होने के नाते अभिषेक की झोली हमेशा फिल्मों से भरी रही लेकिन वे एक बेहतर अभिनेता भी हैं इसकी झलक मनिरत्नम की ही फिल्म युवा में देखने को मिली थी. मनिरत्नम ने युवा फिल्म में अभिषेक के भीतर अभिनय का जो पौधा लगाया था गुरू तक वो एक बरगद का रूप ले चुका है. इस फिल्म में अभिषेक ने क्या कमाल का अभिनय किया है. यूं तो इस फिल्म में बहुत कुछ है देखने को लेकिन अगर किसी एक चीज के लिए यह फिल्म देखनी हो तो बेशक़ वो बात अभिषेक का अभिनय ही है. फिर भी इसका सारा श्रेय मैं अभिषेक को नहीं दूंगा. अगर दर्शक भूले न हों तो कुछ दिनों पहले ही धूम 2 में इसी अभिषेक पर ऋतिक बहुत भारी पड़े थे. बात साफ है श्रेय निर्देशक मनिरत्नम के सिर. मनिरत्नम हमेशा से ही मुख्यधारा में घुसकर सार्थक फिल्में बनाते रहे हैं. राजकपूर की तरह समसामयिक सामाजिक मुद्दों को अपनी फिल्मों की विषयवस्तु बनाने वाले...

मिश्री की डली: मैथिली

अब तक मैंने आपको भोजपुरी लोकसंगीत सुनाया. आज आपको सुनाता हूं दुनिया की मधुरतम भाषाओं में से एक मैथिली के कुछ लोकगीत. इन लोकगीतों का आनंद लीजिये और शुक्रिया कहिये बीबीसी हिंदी की टीम को जिन्होंने इस विषय पर आज सवेरे एक विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किया. यह ऑडियो क्लिप उसी कार्यक्रम का हिस्सा है. मिश्री की डली

मुंबईवासी होने पर गर्व महसूस हुआ…

यह महज़ एक संयोग है कि दफ्तर में हुई देरी की वजह से मैं उन सात ट्रेनों में किसी में नहीं था, नहीं तो क्या होता? इस कल्पना भर से दिल बैठा जा रहा है. साथ ही उन अभागों के लिए आंखे नम हैं जो मेरे सहयात्री हुआ करते थे.  उस दिन कहाँ तो इस बात की योजना बना रहा था कि आज पत्नी अलका के जन्मदिन पर उसे क्या तोहफ़ा दिया जाए… मगर शाम तक यह मंगलवार पूरी मुम्बई के लिए अमंगलकारी हो चुका था. विस्फोटों की ख़बर जंगल में आग की तरह फैली, दफ्तर में हमारे बॉस ने यथाशीघ्र घर जाने का निर्देश दे दिया. लेकिन टेलीविजन पर ट्रेन सेवा के पूरी तरह ठप होने की ख़बरें आ रही थीं.  चिंता इस बात की थी कि अंधेरी में अपने ऑफ़िस से मीरा रोड अपने घर कैसे पहुंच पाऊंगा? तभी मेरे साथ एक और संयोग हुआ, मेरा छोटा भाई (जिसका कभी कभार ही मेरे दफ़्तर की तरफ़ आना होता है) अपनी मोटरसाइकिल लेकर किसी काम से मेरे दफ्तर के पड़ोस में आया हुआ था.  दोनों भाई अंधेरी लिंक रोड से गोरेगांव एसवी रोड होते वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे की तरफ बढ़ें. सड़कों पर भीड़ बड़ी तेजी से बढ़ रही थी, जल्दी ही सड़कों पर क्षमता से बहुत अधिक वाहन थे.  ह...

ब्लॉगर बंधुओ को मुम्बई ब्लॉग का आभार

कोई भी पुरस्कार या सम्मान प्राप्त होने के बाद धन्यवाद देने की पुरानी परंपरा है. इस परंपरा का निर्वाह करते हुए मुम्बई ब्लॉग को Best Indic blog [Hindi] चुनने के लिए मैं आप सबका हार्दिक धन्यवाद करता हूं, साथ ही साथी विजेताओं को शुभकामनाएं भी देता हूं. इस परंपरा का इस्तेमाल मैं अपने दिल की बात करने के लिए भी करना चाहूंगा. पिछले साल जब मैंने ब्लॉगिंग का सफर शुरू किया था तब मैं तो क्या मेरे फरिश्तों ने भी नहीं सोचा था कि सफर इतना रोचक और हमसफर इतने जिंदादिल होंगे. अब तो आलम यह है कि ब्लॉग जगत घर-सा लगता है और साथी ब्लॉगर घर के सदस्य. यहां जिस तरह सब एक-दूसरे के सुख और दु:ख में साथ दीखे वह अभिभूत करने वाला रहा. उम्मीद करता हूं कि हम सब एक-दूसरे से यूं ही जुड़े रहेंगे.

Indibloggies 2005: वोट फोर 'मुम्बई ब्लॉग'

मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य से है कि 'मुम्बई ब्लॉग' Indibloggies 2005: Best Indic Blog Hindi श्रेणी में अंतिम दौर तक आ पहुंचा. आपके प्रोत्साहन और सहयोग के लिए धन्यवाद. अब जब आपने यहां तक पहुंचा ही दिया है तो एक धक्का और लगा दीजिए... 'मुम्बई ब्लॉग' के लिए वोट कीजिए . वैसे तो 'मुम्बई ब्लॉग' ने अपना नया मकान ले लिया है लेकिन घर का अहसास अभी तक धर्मशाला में ही है लिहाजा 'मुम्बई ब्लॉग' के लिए वोट की अपील यहीं से करना सही है. ब्लॉगर से 'मुम्बई ब्लॉग' की विदाई को यादगार बना दीजिए... 'मुम्बई ब्लॉग' के लिए वोट कीजिए . धन्यवाद शशि सिंह

ब्लॉगर से 'मुम्बई ब्लॉग' की विदाई

साल 2005 में ब्लॉगर की मदद से 'मुम्बई ब्लॉग' हिंदी ब्लॉगिंग की मैदान में उतरा. जिसे आप सभी का हर कदम समर्थन, सहयोग और प्रोत्साहन मिला. इसके लिए ब्लॉगर और आप सब का हार्दिक धन्यवाद. अब वक्त आ गया है कि 'मुम्बई ब्लॉग' मुफ्त का चंदन (ब्लॉगर) घिसने की जगह अपनी जेब ढीली करे और नये साल में अपना खुद का आशियाना बनाए. तो लो भैया 'मुम्बई ब्लॉग' ब्लॉगर की धर्मशाला छोड़ अपने आशियाने की ओर चल पड़ा... पता नोट कीजिए:- http://www.mumbaiblogs.in उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि 'मुम्बई ब्लॉग' के नये घर में आपका आना-जाना बना रहेगा. साथ ही 'भोजपुरिया' , 'सिने गॉसिप' और 'बीबीसी से मेरी बात' से संबंधित चिठ्ठे भी अब 'मुम्बई ब्लॉग' के नये आशियाने पर ही मिला करेंगे. धन्यवाद शशि सिंह

राजदीप सरदेसाई को दस में दस

ईमानदार कोशिशें हमेशा रंग लाती है. इसकी ताज़ा मिसाल है अपनी पीढ़ी में सबसे प्रतिभाशाली हिन्दुस्तानी पत्रकार राजदीप सरदेसाई का नया समाचार चैनल सीएनएन-आईबीएन . इस चैनल के टेस्ट सिग्नल की शुरुआत हो गई है और संभवत जनवरी के पहले सप्ताह से यह विधिवत मैदान में होगा. अगर आप पहली नज़र के प्यार पर यकीन करते हैं तो मैं कहना चाहूंगा कि कल रात पहली मुलाकात में ही मुझे सीएनएन-आईबीएन से प्यार हो गया. वैसे तो मैं खुद भी पत्रकार रहा हूं लेकिन इस बहुचर्चित और बहुप्रतिक्षित चैनल के सामने कल मैं एक आम दर्शक के रूप में बैठा था. मेरा अनुभव कहता है कि यह चैनल भीड़ से बिलकुल अलग है. राजदीप के आईबीएन सेना का हर सिपाही अपना बेस्ट देने की कामयाब कोशिश कर रहा था. सबसे मजेदार बात तो मुझे यह लगी कि इनमें से कुछ सिपाही जब दूसरी सेनाओं में थे तब वे इतने योग्य कभी नहीं लगे. इस बात के लिए मुझे एक बार फिर राजदीप के नेतृत्व की तारीफ करनी पड़ेगी. कल तकरीबन ढाई घंटे तक मैंने इनका प्रसारण देखा, न्यूज़ ब्रॉडकास्ट के हर क्षेत्र में यह चैनल नये मानक तय करता मालूम पड़ता है. सही मायने में इस चैनल की शुरुआत के साथ भारत में न्यूज़ ब्रॉडक...

सवेरा होगा

कुछ दूर, नहीं बहुत पास कुछ है, कुछ है वहां एक आकृति कुछ धुंधली-सी इधर ही आती नहीं, मैं ही चलूं वहां देखूं तो क्या वही है जिसकी है तलाश मुझे अरे! यह घुप अंधेरा कहां से आया कहां गई वो शुरू फिर वही तलाश जरूर कोई बात है तभी तो आई ये अमावस-सी रात है शायद मुझे रोशनी की तलाश है वह आकृति नहीं भटकाव था डगमगाया तभी तो मेरा पांव था होगी एक नई सुबह न आकृति होगी... न अंधेरा होगा... सिर्फ सवेरा होगा...

महाराष्ट्र और बिहार दोनों भारत में ही हैं

विश्वनाथ सचदेव लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार और नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक हैं. तीस-चालीस साल पुरानी हो चुकी यह बात। तब मैं नागपुर विश्वविद्यालय में पढ़ता था। जिस हॉस्टल में मैं रहता था, उसमें कई राज्यों के विद्यार्थी थे। सवेरे सबको जल्दी होती थी। गुसलखाने में रोज लाइन लगती थी। गर्म पानी के लिए सिर्फ एक गीजर था। अक्सर झड़प भी हो जाती थी। पर वह झड़प वहीं तक सीमित होती थी। नहा-धोकर फिर सब साथ हो जाते थे। किसी को किसी की 'दादागिरी' से शिकायत नहीं रहती थी। चालीस साल पुरानी ये बातें मुझे मुम्बई के जे.जे. अस्पताल में डॉक्टरी पढ़ रहे विद्यार्थियों के संदर्भ में याद आ रही हैं। हाल ही में यहां भी गर्म पानी पर विवाद हो गया था। पहले भी होता होगा ऐसा विवाद, पर इस बार मामला तूल पकड़ गया। सुना है, कुछ विद्यार्थी फरियाद लेकर शिवसेना के बागी नेता राज ठाकरे के पास जा पहुंचे। उन्हें शिकायत थी कि बाहरी राज्यों के, खासकर बिहार के, विद्यार्थी झगड़ा करते हैं। राज को इन दिनों मुद्दों की जरूरत है। वे तत्काल हस्तक्षेप के लिए तैयार हो गए। राज के प्रतिद्वंद्वी उद्धव को भी भनक लगी। मराठी माणूस का नारा लगाते हु...

अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यों देखते हैं?

हम फिल्में क्यों देखते हैं? जाहिर सी बात है फिल्में बनती हैं इसलिए हम फिल्में देखते हैं. यकीन मानिये अगर फिल्में नहीं बनतीं तो हम कुछ और देखते. मसलन, कठपुतली का नाच, तमाशा, जात्रा, नौटंकी, रामलीला या ऐसा ही कुछ और. खैर सौभाग्य या दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है इसलिए हम वापस फिल्मों की ओर चलते है. शुरू करते हैं सिनेमाघर में पहली फिल्म देखने से. इस मंदिर में मैंने पहली पूजा स्कूल से निकलने और कॉलेज में दाखिले के पहिले की थी. नाम तो ठीक-ठीक याद नहीं पर फिल्म में हिरोइन अपने अजय देवगन की श्रीमती (तब कुवांरी) काजोल थीं और शायद उनकी भी यह पहली ही फिल्म थी. ( पहली फिल्म देखने में मैंने इतनी देर क्यों की? मुगालते में मत रहिये... शराफत के किस्से आगे हैं.) कोलफील्ड की हमारी कॉलोनी शहर से बीस किलोमीटर दूर थी और हम बच्चों की पूरी दुनिया कॉलोनी तक ही सीमित हुआ करती थी. लिहाजा शहर के सिनेमाघर में यह फिल्म देखना मेरे लिए बड़ा ही साहसिक कदम और नये अनुभवों से भरा था... उस दिन तो मानो खुले आसमान में पहली उड़ान-सा अहसास था. अब चलिए जरा पीछे के कालखंड में चलकर मेरे फिल्में देखने के कारणों की पड़ताल करते हैं. तकर...

चांद बिक गया

अब तो आशिकों की आफ़त आई समझो... ग़लती से भी कहीं माशूका के सामने कह दिया कि 'मेरी जान! तुम कहो तो तुम्हारे लिए चांद तोड़ लाऊं', तो समझो मियां आप तो फंसे. बच्चों की लोरी से लेकर आशिकों की शायरी तक में चांद की रुमानियत को पाना हसीन ख़्वाब रहा है. लेकिन अब शायद ऐसा न रहे... क्योंकि चांद का काफी हिस्सा बिक गया है. जो बचा है उसकी भी दुकान सजी है. हां यह बात दीगर है कि खरीदने जाओ तो धरती पर अपना घर-द्वार बेचना पड़ जाये.

हनुमान बने बॉलीवुड के संकटमोचन

अभी-अभी मैं एनिमेशन फिल्म हनुमान देखकर आ रहा हूं. मजा आ गया. फिल्म की पूरी टीम बधाई की पात्र है. ऐसे प्रयासों को देखकर अब यकीन हो चला है कि बॉलीवुड में अभी जिने की तमन्ना बाकी है. इस फिल्म की तीन बातों के लिए तारीफ करनी होगी: 1. उच्च तकनीक का बेहतर इस्तेमाल 2. पश्चिम की नकल न करके अपने पौराणिक कथावस्तु की क्षमता में यकीन 3. हनुमान के बाल रूप का बेहतर चित्रण संगीत और संवाद वगैराह भी अच्छे रहे. कुल मिलाकर हनुमान एक साहसिक प्रयास है जो बॉलीवुड की तरफ से कुछ नया नहीं मिलने की शिकायत करने वालों को जरूर पसंद आयेगा. , पता नहीं बजरंगबली बॉक्स ऑफिस पर अपनी ताकत दिखा पायेंगे या नहीं पर इस फिल्म ने मुझे बेहद प्रभावित किया है. उम्मीद है आपको भी पसंद आयेग़ी. पर एक मिनट रूकिए... भाभीजी और बच्चों को साथ ले जाना मत भूलिएगा.

नवरात्र माहात्म्य

नवरात्र के महत्व के बारे में दैनिक 'आज' में पूर्व प्रकाशित मेरा आलेख हिन्दू पंचागके अनुसार आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा तिथिको नवरात्रिका आरम्भ होता है. शरद ऋतुमें होने के कारण इसे शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है. 'मारकण्डेय पुराण' अध्याय 89 श्लोक 11 में कहा भी गया है कि 'शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी' और 'निर्णयसिन्धु' नामक धार्मिक विवादोंका समाधान करने वाला ग्रंथ भी यही मानता है. परंतु संस्कृतके प्रसिद्ध वैयाकरण नागोजी भट्टने 'वार्षिकी' को वासंती नवरात्र बोधक कहा है. 'निर्णयामृत' और 'समय मयूख' जैसे ग्रंथ भी इसका समर्थन करते हैं. ऐतिहासिक दृष्टिसे दुर्गापूजाका वर्तमान रूप कमोवेश दो हजार वर्ष पुराना है. षोडश मातृका अर्द्धनारीश्वर और देवीके गलेमें कपालमालाका उल्लेख महाकवि कालिदास कृत 'कुमार संभवम' में भी मिलता है. जिसका समय ईसापूर्व प्रथम शताब्दी है. इस तिथिपर भले ही विवाद हो लेकिन प्रथम-द्वितीय शताब्दीके कुषाण राजा कनिष्कके (या उसके बाद चंद्रगुप्त प्रथमके भी) सिक्कोंपर दुर्गाका वर्तमान रूप मिलता है. 'नवरात...

अकेली मां ही नहीं अब अकेला बाप भी

कभी-कभी कोई छोटी-सी घटना बड़ी बहस को जन्म दे देती है. पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के एक इन्फ़र्टिलिटी क्लीनिक में रविवार को जन्मे बच्चे अर्जुन ने समाज और कानून के स्तर पर कुछ ऐसी तरह की बहस की शुरुआत की है. (ख़बर यहां पढ़िये) तकनीक की मदद से मां बनती अकेली महिलाओं पर बहस अभी थमा भी नहीं कि अकेले बाप का मुद्दा हमारे सामने है. अकेली मां बनने के पीछे वजह जो भी गिनाया जाता रहा हो मगर मेरी समझ से असली मकसद महिलाओं द्वारा पुरुष प्रधान समाज को चुनौती देना ही है. ऐसे में एक तलाकशुदा पुरुष द्वारा अकेला बाप बनने का निर्णय लेना कहीं उस चुनौती का जवाब तो नहीं? एक तरफ तो इस तरह के मातृत्व या पितृत्व सुख में अपने विपरीत लिंगी साथी की भागीदारी को नकारा जा रहा है वहीं कुछ देशों में समलिंगी विवाह (?) को मिल रही मान्यता एक डर पैदा कर रही है. मैं यह सोचने को विवश हो गया हूं कि कहीं समाज की मूलभूत संरचना में ही तो बदलाव नहीं हो रहा है?

"भोजपुरिया" का पदार्पण

मुम्बई ब्लॉग के माध्यम से यह सूचित करते हुए मुझे अपार हो रहा है कि ब्लॉग जगत में हिंदी की छोटी बहन भोजपुरी को समर्पित एक ब्लॉग "भोजपुरिया" का पदार्पण हो चुका है. संभवत: यह भोजपुरी का पहला ब्लॉग है. "भोजपुरिया" सिर्फ ब्लॉगिंग न होकर पॉडकास्टिंग भी है जिसमें भोजपुरिया को आवाज़ देने की भी कोशिश की गई है. मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि जिस तरह आपने "मुम्बई ब्लॉग" को अपना स्नेह दिया है वैसा ही प्यार "भोजपुरिया" को भी मिलेगा. धन्यवाद.